Description of the Book:
 

About Book

भला "नास्टैल्जिया " में कभी कोई लौट पाया है क्या? जैसा की हिरैत का मतलब है, यह किताब एक कोशिश है ऐसे टाइम और स्पेस में जाने की जिसकी हमें आरज़ू तो है पर शायद वहाँ जाना मुमकिन नहीं। लगभग ५ साल के वक़्फ़े में पूरी की गयी इस किताब में जहाँ सूरज हमारी ज़िन्दगी के कई नोस्टालजिक मह्सूसात को सामने रखते हैं तो वहीं अपने सूरज से "हिरैत" बनने के सफर को भी बयां करते हैं।

"इमेजरी पोएट्री" में ख़ास दिलचस्पी होने की वजह से सूरज ने इस किताब के एक एक नज़्म को महज़ लिखा नहीं बल्कि बनाया है, जैसे कोई कुम्हार अपनी सबसे महीन सुराही बनाता है या कोई हलवाई अपनी सबसे बेहतरीन मिठाई।

हिरैत

₹50.00Price
  • Author Name:  सूरज साहू
    About the Author:  सूरज साहू की पैदाइश झारखण्ड में रामगढ जिले के एक छोटे से गाँव सोनडीहा की है । कुछ साल गाँव में बिताने के बाद डॉन बॉस्को अकादमी नाम के बोर्डिंग स्कूल भेज दिए गए, जहाँ उनका बाकी का बचपन हॉस्टल में गुज़रा। हॉस्टल ब्रिटिश राज में एंग्लो इंडियन कम्युनिटी के बसाये कुनबे मैक्लुस्कीगंज में था, जिसे मिनी लंदन या लिटिल इंग्लैंड भी कहा जाता है । छोटी सी उम्र में अपना घर,अपने गाँव छोड़ने की एक गहरी छाप ज़ेहन में छूटी और फिर जिस भी शहर गए, उन शहरों से रिश्ते बनाते गए। शहरों से रिश्ते बने, शहरों में किस्से मिले, नज़्में मिलीं, अफ़साने मिले और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नोलॉजी (निफ्ट), गांधीनगर में एडमिशन के बाद मिला उन्हें लिखने का माहौल। निफ्ट में अपने ६ दोस्तों के साथ "छाप" नाम का थिएटर ग्रुप शुरू किया और नाटक लिखने और डायरेक्ट करने लगे। नाटक से नज़्में, नज़्मों से अफ़साने और अफ़सानो से यह सिलसिला फिल्मों तक जा पहुँचा। फिल्मों में उनके रुझान को एफटीआईआई ने पंख दिए और कुछ महीने वहां वक़्त बिताने के बाद सूरज मुंबई पहुँच गए ।सूरज, आज मुंबई में बतौर स्क्रीनप्लेडायलॉग राइटर काम कर रहे हैं और आगे चलकर खुद की फिल्में डायरेक्ट करना चाहते हैं।
    Book ISBN: 9781005712068